ग्लेशियरों के पिघलने से बनी 897 झीलें कभी भी कहर बरपाने को तैयार!


हिमाचल का पर्यावरण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग करवाएगा ग्लेशियर झीलों की मैपिंग
शिमला/अक्षर सत्ता/ऑनलाइन। हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के पिघलने से बनी 897 झीलें कभी भी हिमाचल में कहर बरपा सकती हैं। इनमें से ग्लेशियरों से बनी अकेले 562 झीलें सतलुज बेसिन में हैं जबकि 242 झीलें चिनाब घाटी बेसिन में हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बनी इन झीलों से उत्पन्न खतरे को भांपते हुए हिमाचल प्रदेश के पर्यावरण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने ग्लेशियर झीलों की मैपिंग का कार्य आरंभ कर दिया है। ग्लेशियर से बनी इन झीलों की मैपिंग के लिए स्पेस तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। पर्यावरण विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग का पर्यावरण परिवर्तन केंद्र इन झीलों की मैपिंग और निगरानी कर रहा है। ये मैपिंग और निगरानी हिमाचल तथा साथ लगते तिब्बतीयन हिमालय क्षेत्र में की जा रही है।


2018 की तुलना में 2019 में झीलों में 33 प्रतिशत की वृद्धि - पर्यावरण परिवर्तन केंद्र द्वारा किए गए अब तक के अध्ययन में पता चला है कि वर्ष 2018 की तुलना में वर्ष 2019 में ग्लेशियरों से बनी इन झीलों में लगभग 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अभी तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार जलवायु परिवर्तन केंद्र द्वारा 2019 में किए गए शोध के आधार पर सतलुज बेसिन में पाई गई 562 झीलों में से लगभग 81 प्रतिशत यानी 458 झीलें पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल की हैं। 9 प्रतिशत यानी 53 झीलें पांच से दस हेक्टेयर क्षेत्रफल की और नौ प्रतिशत यानी 51 दस हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल की हैं। इसी तरह चिनाब घाटी में बहने वाली चंद्रा, भागा और मियार सब बेसिन में 242 झीलें हैं। इनमें से 52 झीलें चंद्रा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में, 84 झीलें भागा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में और 139 झीलें मियार सब बेसिन में हैं। प्रदेश की ब्यास घाटी में ग्लेशियर से बनी सबसे कम 93 झीलें हैं। इनमें से 12 झीलें ऊपरी ब्यास क्षेत्र में, 41 झीलें जीवा में और 37 झीलें पार्वती सब बेसिन में है।


5 से 10 हेक्टेयर क्षेत्र की झीलें नुकसान की दृष्टि से संवेदनशील : राणा - हिमाचल प्रदेश सरकार में विशेष सचिव व निदेशक राजस्व और आपदा प्रबंधन डीसी राणा के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में हिमालय क्षेत्र और इसके साथ लगते तिब्बतियन हिमालय क्षेत्र के ऊंचे इलाकों में ग्लेशियर से बनने वाली झीलों की संख्या में तेजी आई है। उनका कहना है कि 20 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र और 5 से 10 हेक्टेयर क्षेत्र की झीलें नुकसान की दृष्टि से संवेदनशील हैं। इनके टूटने की स्थिति के मद्देनजर राज्य के हिमालय क्षेत्र में पर्याप्त निगरानी और परिवर्तन विश्लेषण आवश्यक है।


पहले भी हुआ है नुकसान - पर्यावरण विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव रजनीश के मुताबिक विभाग हिमालय में बर्फ पिघलने के कारण बनी सभी ग्लेशियर झीलों की मैपिंग में जुट गया है। इन झीलों में काफी मात्रा में पानी होने के कारण ये झीलें भविष्य में नुकसानदेह साबित हो सकती हैं। उनका कहना है कि वर्ष 2014 में भारी बारिश के कारण चोराबरी ग्लेश्यिर के आगे बनी छोटी झील के फटने के कारण केदारनाथ जैसी बड़ी त्रासदी हुई थी। हिमाचल प्रदेश में भी सतलुज घाटी में वर्ष 2000 में भारी बाढ़ आई थी जिससे 800 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ था। ये घटना बादल फटने या ग्लेश्यर झील के फटने से तिब्बतियन हिमालय क्षेत्र में हुई थी।


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