मध्यप्रदेश : एफआईआर में देरी के आधार पर दुष्कर्म के आरोपी को बरी करने का हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द



नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकी दर्ज करने में देरी के आधार पर दुष्कर्म के एक आरोपी को बरी करने के मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को ‘पूरी तरह से समझ से परे' करार दिया है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा है कि इस मुकदमे के तथ्य ‘दिल तोड़ने वाले' हैं। 

पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए इसे ‘विकृत और कानून में न टिकने योग्य' करार दिया है। यह आदेश 12 अगस्त को पारित किया गया था, लेकिन इसकी प्रति शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर प्रकाशित होना बाकी है। 

पीठ की तरफ से आदेश लिखते हुए जस्टिस पारदीवाला ने कहा, “हम पुनरावृत्ति की संभावनाओं के मद्देनजर यह स्पष्ट करते हैं कि रद्द किया गया उच्च न्यायालय का आदेश पूरी तरह से समझ से परे है। हमारे सामने अभी तक कोई ऐसा मामला नहीं आया है, जिसमें उच्च न्यायालय ने प्राथमिकी दर्ज करने में देरी के आधार पर दुष्कर्म के आरोपी को आरोप मुक्त करना उचित समझा हो।”

हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपी अमित कुमार तिवारी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-306 (खुदकुशी के लिए उकसाना) के तहत दंडनीय अपराध से बरी करने के निचली अदालत के फैसले में दखल नहीं दिया। पीठ ने हाईकोर्ट के दो दिसंबर 2021 के आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि ध्यान देने योग्य यह बात है कि उच्च न्यायालय ने मृतका (दुष्कर्म पीड़िता) की उम्र के संबंध में दलीलें दर्ज करने के लिए दो पैराग्राफ समर्पित किए हैं, बावजूद इसके उसकी तरफ से इस मामले में कोई विशिष्ट निष्कर्ष नहीं दिया गया है। 

शीर्ष अदालत ने कहा, “उच्च न्यायालय पूरी तरह से अलग दिशा में आगे बढ़ा। उसने आरोपी को सभी आरोपों से इस आधार पर मुक्त करना उचित समझा कि प्राथमिकी दर्ज करने में देरी हुई और मृतक के माता-पिता द्वारा पेश किया गया पूरा मामला संदिग्ध था।” 

पीठ ने कहा कि कानून में यह प्रावधान है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा-482 के तहत दायर किसी अर्जी या धारा-397 के तहत दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर विचार करने वाला उच्च न्यायालय निचली अदालत द्वारा तय आरोपों को रद्द करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन ऐसा साक्ष्य के औचित्य या पर्याप्तता के आकलन के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। 

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आरोप रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय को यह सिद्धांत अपनाना चाहिए कि अगर अभियोजन पक्ष द्वारा पेश सभी सबूतों पर यकीन करना है तो इससे अपराध बनता है या नहीं। 

पीठ ने कहा कि कानून में यह भी स्पष्ट है कि जब आरोपी द्वारा उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों को रद्द करने की मांग को लेकर कोई याचिका दाखिल की जाती है, तब ऊपरी अदालत को उस समय तक आदेश में दखल नहीं देना चाहिए, जब तक यह साबित करने की पर्याप्त वजह न हो कि न्याय के हित में और अदालती कार्यवाही का दुरुपयोग रोकने के लिए आरोपी पर लगाए गए आरोपों को रद्द करना जरूरी है। 

उच्चतम न्यायालय ने सरकार द्वारा आदेश के खिलाफ कोई अपील न दायर करने की भी आलोचना की। पीठ ने कहा कि यह ‘इस मुकदमे का परेशान करने वाला तथ्य' है कि मृतका के पिता को न्याय के लिए इस अदालत का रुख करना पड़ा। 

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए निचली अदालत को 18 दिसंबर 2020 को आरोप तय करने के संबंध में दिए गए फैसले के अनुसार सुनवाई करने की अनुमति दे दी।

ये है मामला 
मालूम हो कि 27 अप्रैल 2020 को पीड़िता ने पेट दर्द की शिकायत की थी और इसे पेट के ट्यूमर का मामला समझकर उसे एक निजी नर्सिंग होम ले जाया गया था। नर्सिंग होम में डॉक्टर का इंतजार करने के दौरान लड़की ने बेंच पर ही एक शिशु को जन्म दिया था, जिसके बाद उसे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया था। लड़की ने अपने पिता से कहा था कि अमित कुमार तिवारी उसके बच्चे का पिता है और वे दोनों पास के शहर में अपने बच्चे के साथ एक नया जीवन शुरू करेंगे। इसके बाद लड़की का पिता पैसों का इंतजाम करने के लिए गांव चला गया। वह जब लौटा तो लड़की कथित तौर पर खुदकुशी कर चुकी थी और उसका बच्चा ड्रेसिंग टेबल पर लेटा हुआ मिला था। पिता ने आरोपी तिवारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। निचली अदालत ने तिवारी पर दुष्कर्म और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण कानून (पॉक्सो) के विभिन्न प्रावधानों के तहत आरोप तय किए थे।

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