साहित्यिक पत्रिका की नई कोंपल अन्विति

उम्मीदों से कभी विरत नहीं होंगे : राजेन्द दानी (सम्पादक अन्विति)



जबलपुर। जो शुरू होता है बंद होता ही है। ज्ञानरंजन के सम्पादन में जबलपुर से निकलकर देश के सुदूर कोने कोने और विदेशों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली पत्रिका ‘‘पहल’’ भी अब बंद हो गई। जिस तरह कहानीकार ज्ञानरंजन अपनी 25-26 कहानियों की वजह से कहानियों के इतिहास का हिस्सा हैं; ठीक उसी तरह ‘पहल’ के सम्पादक के रूप में भी उन्होंने हिन्दी साहित्यिक पत्रिकारिता को नये आयाम दिये और पहल और ज्ञानरंजन ने अभूतपूर्व प्रतिष्ठा अर्जित की ।

अपनी लेखनी की वजह से दुनिया भर में सर्वोच्च प्रतिष्ठा पाने वाले व्यंग्य गुरु भले इस शहर में न जन्मे हों, पर बड़े यहीं हुए। इतने बड़े की उनकी ऊँचाइयों और विस्तार को छूना सरल तो नहीं ही है। परसाई के सम्पादन में निकली ‘‘वसुधा’’ प्रगतिशील लेखक संघ की वजह से अब भी  जब कभी लड़खड़ाती सी दिख जाती है।

सन् 1975 से 80 के बीच रमेशचंद्र शर्मा ‘निशिकर’, श्रीराम अयंगर, महेश शुक्ल के संयुक्त सम्पादन में व्यंग्य केन्द्रित पत्रिका ‘‘व्यंग्यम’’ का प्रकाशन जबलपुर से हुआ। व्यंग्यकारों के बीच में इसकी लोकप्रियता देश व्यापी रही।

‘‘अन्विति’’ के सम्पादक राजेन्द्र दानी देश के प्रतिष्ठित कथाकार हैं। उनके दो उपन्यास भी प्रकाशित और चर्चित हैं - प्रवेशांक में ही उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट कर दीं - ‘‘अपने समय की सांस्कृतिक चेतना की खोजबीन और पड़ताल हमारे उद्देश्य हैं। ये जारी रहेंगे...।’

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