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हुमायूं |
नई दिल्ली। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने दिल्ली स्थित हुमायूं के मकबरे का निरीक्षण किया है। संगठन के अनुसार, इस दौरे का उद्देश्य दिल्ली के ऐतिहासिक संदर्भों का अध्ययन करना है। विहिप के प्रतिनिधिमंडल ने इस ऐतिहासिक स्थल का भ्रमण कर इसकी वास्तुकला, इतिहास और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी ली।
यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब महाराष्ट्र में औरंगजेब की कब्र को हटाने की मांग को लेकर कुछ हिंदू संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। इन संगठनों का कहना है कि औरंगजेब एक क्रूर शासक था, जिसने हिंदुओं पर अत्याचार किए थे। इस पृष्ठभूमि में, अब हुमायूं के मकबरे को लेकर भी विमर्श शुरू हो गया है।
विहिप के निरीक्षण का उद्देश्य क्या?
विहिप के नेताओं का कहना है कि उनका मकसद इतिहास की वास्तविकताओं को समझना और ऐतिहासिक धरोहरों के संदर्भों का अध्ययन करना है। विहिप के प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा कि हुमायूं का मकबरा ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्थल है, और इस पर शोध करने की जरूरत है। संगठन का मानना है कि इतिहास को नए सिरे से देखने और उसकी सही व्याख्या करने की आवश्यकता है।
कुछ हिंदू संगठनों का तर्क है कि जिन शासकों ने भारत में धार्मिक असहिष्णुता और अत्याचारों को बढ़ावा दिया, उनकी कब्रों और स्मारकों को लेकर एक व्यापक चर्चा होनी चाहिए। महाराष्ट्र में औरंगजेब की कब्र को लेकर जारी विवाद के बाद अब दिल्ली में हुमायूं के मकबरे को लेकर भी नई चर्चाएँ शुरू हो गई हैं।
इतिहास और विवाद की पृष्ठभूमि
हुमायूं, बाबर के बाद भारत का दूसरा मुगल शासक था और उसने 1530 से 1540 और फिर 1555 से 1556 तक शासन किया। उसकी मृत्यु के बाद, उसकी बेगम हमीदा बानो ने 1565 में हुमायूं के मकबरे का निर्माण करवाया। यह मकबरा मुगल वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी है।
हालांकि, कुछ संगठनों का कहना है कि इतिहास को सही दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। उनके अनुसार, मुगलों ने भारत में विदेशी शासन को स्थापित किया और कई हिंदू धार्मिक स्थलों को क्षति पहुँचाई। इसी संदर्भ में, वे ऐतिहासिक स्मारकों और शासकों के आचरण की पुनः समीक्षा की मांग कर रहे हैं।
आगे क्या होगा?
विश्लेषकों का मानना है कि विहिप के इस निरीक्षण के बाद हुमायूं के मकबरे को लेकर एक नई बहस शुरू हो सकती है। महाराष्ट्र में औरंगजेब की कब्र को हटाने की मांग के बाद अब दिल्ली में भी इसी तरह की मांग उठने की संभावना है।
हालांकि, इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का कहना है कि ऐतिहासिक स्थलों को वर्तमान संदर्भों में देखना उचित नहीं होगा, क्योंकि ये स्मारक अतीत की धरोहर हैं। लेकिन दूसरी ओर, कुछ संगठन मानते हैं कि ऐतिहासिक स्थलों और शासकों की सही पहचान और समीक्षा आवश्यक है।
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