आलेख : शक्ति पर्व पर दुर्गा के नौ स्वरूप के पूजन के गूढ़ार्थ लेखक - सुसंस्कृति परिहार


लेखक - सुसंस्कृति परिहार 


भारत में नवरात्रि, देवी दुर्गा के नौ अवतारों या स्वरूपों की पूजा करने का एक प्रसिद्ध त्योहार है। जिसे शक्ति या देवी के रूप में भी जाना जाता है। यह त्योहार एक बार वसंत ऋतु के दौरान चैत्र नवरात्रि और दूसरी बार शरद ऋतु के दौरान शारदीय नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है।

ऋग्वेद के दसवें मंडल में एक पूरा सूक्त शक्ति की आराधना पर आधारित है, जिसमें शक्ति की भव्यता का दुर्लभ स्वरूप मुखरित हुआ है। 'मैं ही ब्रह्म के दोषियों को मारने के लिए रुद्र का धनुष चलाती हूं। मैं ही सेनाओं को मैदान में लाकर खड़ा करती हूं। मैं ही आकाश और पृथ्वी में सर्वत्र व्याप्त हूं। मैं ही संपूर्ण जगत की अधिकारी हूं।"

दुर्गा माता के विभिन्न स्वरूपों का यदि सूक्ष्म और तार्किक परीक्षण किया जाए तो नव देवियों में स्त्रियों के नौ स्वरूप आज भी हम आसानी से देख सकते हैं किंतु इसके लिए साफ़ सुथरे मन की आवश्यकता होती है। अफ़सोसनाक तो यह भी है स्त्रियां भी अपने इन स्वरुपों को नहीं पहचानती हैं। पुरुषवादी समाज ने उनकी आंखों को बंद कर रखा। इसके बरक्स जो महिलाएं इस ताकत को जान लेती हैं वे देवियों से कम नहीं होती है।देवी स्वरूप तो हम सिर्फ सुनते आए हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि पुरुषवादी समाज से लोहा लेती हुई वे इन देवियों से कम नहीं है। नौ दिवसीय इस शक्ति पर्व में महिलाओं से ज़्यादा पुरुष इन देवियों की आराधना करते हैं। बंगाल में तो छोटी बच्ची से लेकर बुजुर्ग महिलाओं को काली मां व्यंग्य में कहते हैं। यह उनमें मातृशक्ति के डर और भय को रेखांकित करता है। सिर्फ मां का संबोधन भी इन्हीं दुर्गा मां के सभी स्वरूपों से दो-चार कराता है।

कहने का आशय यह है कि वह मौजूदा मां और स्त्री के सभी रूपों में नवरात्र की मांओं को देखता है। किंतु उसे वह सम्मान नहीं देता जो मंदिरों और पंडालों में बैठी शक्ति की आराधना के समय देता है।काश स्त्री को यह सम्मान मिल जाता तो स्त्री सम्बंधी होने वाले अपराधों में दिनों दिन वृद्धि नहीं होती।

इसकी वजह है, सदियों से हमारा समाज पितृसत्तात्मक रहा है, जिसमें मूलतः सारी सत्ता या रूल ऑफ लॉ पुरुषों के हक में है। लड़कों के दिमाग में बचपन से ही घर का मुखिया और महिलाओं को कमतर समझने की भावना भर दी जाती है। इससे आगे चलकर लड़के, महिला की प्रताड़ना को स्वीकृति देने लगते हैं। स्थिति ज्यादा दुखदायी तब हो जाती है, जब प्रताड़ना झेलने के बावजूद समाज महिलाओं का साथ नहीं देता। महिला अगर अपराध के खिलाफ लड़ने का फैसला करती भी है तो परिवार उसे डांट-डपटकर चुप करा देता है। असल में, समाज में घट रही इन वारदातों के पीछे परिवार भी प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।

कोलकाता में हुआ बर्बर बलात्कार और हत्याकांड भारत जैसे सभ्य होने का दावा करने वाले देश के लिए एक और शर्म का विषय है। देश में बेटियां हर जगह असुरक्षित महसूस कर रही हैं। आज कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश , राजस्थान  देश में सबसे आगे हैं लेकिन इसकी समाज को कोई चिंता नहीं। अब तो जैसे कोई भी विश्वास के योग्य नहीं रहा। जब जज भी ऊल-जलूल  फैसला दे रहे हैं अपने ही आज हैवान बन रहे हैं। बहू-बेटियां घर में भी असुरक्षित हैं। ऐसी घटनाओं से सरकारों के सुरक्षा संबंधी दावों की भी पोल खुल गई है। आखिर कब तक मां बेटियां दरिंदगी का शिकार होती रहेंगी? कोलकाता  घटना के तत्काल बाद महाराष्ट्र के बदरापुर की घटना भी हृदय विदारक है। 

महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भारी मन से नारी अत्याचार पर जब ये कहती हैं -"मैं भयभीत हूं,निराश हूं।" तब आगे कुछ कहना मायने नहीं रखता। यह नारी अस्मिता की असलियत है।

अब गहन प्रश्न यह है कि जब राष्ट्रपति जी इस मुद्दे को सामने लाती है तो कोई बड़ा ऐक्शन लेने सरकार को क्यों नहीं कहतीं। जबकि उनके पास भी  संवैधानिक अधिकार हैं।  यह सब इंगित तो यही करता है कि ऊपर से लेकर निचले स्तर पर आज भी उस पितृसत्तात्मक समाज का राज है ,वे उनसे भयभीत हैं।

क्या इस समाज को शक्ति पर्व की उपासना का अधिकार होना चाहिए जो निरंतर महिलाओं से लेकर बच्चियों तक को अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं। सरकार ऐसे दुष्कर्म करने वालों के साथ मित्रवत व्यवहार में मशगूल हैं। दुष्कर्मी सम्मानित होते हैं, तब उससे उम्मीद निरर्थक है।

ये बात सच है कि सभी पुरुष ऐसे नहीं हैं किंतु ऐसे निकृष्ट पुरुषों के ख़िलाफ़ उन्होंने आवाज क्यों नहीं उठाई? क्या वे भी पितृसत्तात्मक समाज की मन: स्थिति वाले हैं। यदि नहीं तो खुलकर सामने आना चाहिए। इसलिए जब देश में नारी सम्मान और सशस्त्रीकरण की बात आती है तो तकलीफ होती है। कथनी करनी का भेद सामने दिखता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शक्ति पर्व के बहाने स्त्री के नौ स्वरूपों को समझा जाए उनको इज़्ज़त बख़्शी जाए। पुरुष की देवी भक्ति सिर्फ नौ दिन मंदिरों में ही नज़र ना आए बल्कि हर स्त्री की सुरक्षा और सम्मान का बीड़ा उठाया जाए। क्योंकि जब अत्याचार बढ़ता है तो वह नीला ड्म  बन जाता है। स्त्री को तब महाकाली या चंडी रुप धारणी बन जाती है।

यह शक्ति पर्व स्त्री के सभी स्वरूपों से सामंजस्य का एक बड़ा संदेश देता है। इसे याद दिलाने संभवत यह पर्व साल में दो बार  मनाया जाता है। यह सच है कि शक्ति के बिना शिव भी शव के समान हैं।

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